राम विलास पासवान के निधन के बाद बिहार मे बदल जायेगा चुनावी मोड़ जाने कैसे



राम विलास पासवान के निधन के बाद बिहार मे बदल जायेगा चुनावी मोड़ जाने कैसे 

दोस्तों जैसा की आप जानते है की बिहार मे अभी चुनाव का माहोल चालू है इसी के बिच गद्दावर नेता राम विलास पासवान जी का निधन हो गया. इसी से बिहार रन मे वोटो मे बदलाव होता दिख राहा है इसी के बारे हम आज जानने वाले है चलिए जानते है विस्तार से.. 

लंबे समय से चल रहे थे बीमार राम विलास पासवान 

रामविलास पासवान लंबे समय से बीमार चल रहे थे, उन्होंने राजनीति में एक लंबा समय बिताया है. रामविलास पासवान वीपी सिंह, एचडी देवेगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी इन सभी प्रधानमंत्रियों के ‘कैबिनेट’ में अपनी जगह बनाने वाले शायद एकमात्र व्यक्ति थे.



1969 में पहली बार पहुंचे थे बिहार विधानसभा

राजनीति की नब्ज पकड़ने वाले रामविलास पासवान पहली बार 1969 में एक आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य के रूप में बिहार विधानसभा पहुंचे थे. 1974 में राज नारायण और जेपी के प्रबल अनुयायी के रूप में लोकदल के महासचिव बने थे. वे व्यक्तिगत रूप से राज नारायण, कर्पूरी ठाकुर और सत्येंद्र नारायण सिन्हा जैसे आपातकाल के प्रमुख नेताओं के करीबी रहे है. 



पूर्वकेंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का निधन बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों पर बहोत बडा असर देखने को मिलने वाला है. इस चुनाव में नीतीश कुमार को उखाड़ फेंकने का दम भरा है. ऐसे में सीनियर पासवान के निधन से लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) सहानुभूति वोट बटोर सकती है दोस्तों. 





पासवान के जाने से दुसाध वोट चिराग के साथ खड़े हो सकते है. रामविलास पासवान दशकों तक दुसाधों के सबसे बड़े नेता रहे. चुनाव में दुसाधों की सक्रिय भागीदारी के चलते ही पासवान की राजनीतिक ताकत कभी कमजोर नहीं हुई है. चिराग उसी ताकत को नीतीश के खिलाफ इस्‍तेमाल करना चाहते है दोस्तों. 




दुसाध एकजुट होकर एलजेपी को वोट करने की संभावना 

सीनियर पासवान बीमार होने के चलते पहले ही इन चुनावों में भागीदारी नहीं करने वाले थे. ऐसे में सवाल उठ रहे थे कि चिराग क्‍या दुसाधों को उसी तरह साध पाएंगे जैसे उनके पिता करते थे. पूर्व केंद्रीय मंत्री के निधन ने इसकी संभावना बढ़ा दी है कि दुसाध एकजुट होकर एलजेपी के लिए वोट करें. पार्टी ने गुरुवार को नीतीश और जेडीयू को झटका लेने वाले प्‍लान पर कदम आगे बढ़ा दिए है. 



करीब महीना भर पहले चिराग ने पिता की बीमारी का जिक्र करते हुए कहा था कि वह उनके राजनीतिक काम को आगे बढ़ाना चाहते है. बीमारी के चलते पासवान प्रचार भी नहीं करने वाले थे. एक दलित नेता के रूप में पासवान का जो कद था, वह बिहार ही नहीं, राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेता थे. 



चुनाव में बीजेपी-जेडीयू से होना है माहा मुकाबला 

बीजेपी के लगभग हर बड़े नेता ने पासवान के निधन पर शोक जताया है. हालांकि चुनाव में बीजेपी और जेडीयू को एलजेपी से दो-दो हाथ करने पड़ेंगे. ऐसे कयास है कि बीजेपी ने एलजेपी को भी साधा हुआ है लेकिन वह ऐसी परिस्थिति नहीं चाहती जहां जेडीयू के साथ उसका गठबंधन बहुमत से दूर रह जाए क्‍योंकि तब चिराग को ऐडवांटेज होगा. चुनाव प्रचार शुरू रहा है, ऐसे में बीजेपी पासवान को श्रद्धांजलि तो देगी लेकिन एलजेपी का विरोध करेगी, बीजेपी के शीर्ष नेता नीतीश कुमार के लिए अपना समर्थन बार-बार दोहरा चुके है. 



चिराग के आगे खुद को साबित करने की चुनौती

पासवान का जाने से चिराग पर खुद को साबित करने का दबाव बढ़ गया है. सीनियर पासवान कई विरोधाभासों के बावजूद अपने राजनीतिक लक्ष्‍य हासिल कर लेते थे. सीनियर पासवान ने वाजपेयी सरकार में मंत्रालय बदलने पर एनडीए छोड़ दिया था और फिर यूपीए में मंत्री बने. 



इसके बावजूद उन्‍होंने बीजेपी से हाथ मिलाया और 2014 में फिर केंद्र में मंत्री पद हासिल किया. हाल ही में चिराग ने वोटर्स और पार्टी कार्यकर्ताओं से अपील में कहा था कि ‘पापा का अंश हूं इसलिए उन्‍हें पता है कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में सफल होते है’ सूत्रों के मुताबिक, एलजेपी लोगों के बीच जाकर यह कहेगी कि वह पासवान के ‘सपने’ को पूरा करेगी दोस्तों. 


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