मराठी फ़िल्म इंडस्ट्री का सफर : जहाँ ये थे दिग्गज कलाकार


मराठी फ़िल्म इंडस्ट्री का सफर : जहाँ ये थे दिग्गज कलाकार 

दोस्तों आज हम बात करने वाले है मराठी इंडस्ट्री के वो बड़े बड़े चहरे जिन्होने पूरी इंडस्ट्री अपने दम पर चलायी है. मराठी मूवी जो फ़िल्म के युग की शुरवात रही है. यहाँ से ही फ़िल्म की दुनिया हमारे देश मे आयी है. इंडिया के फ़िल्म इंडस्ट्रीज के आदि पुरुष धुनदिराज गोविन्द फाड़के उर्फ़ दादा साहेब फाड़के मराठी माणूस है. भारत की पहली फीचर्स फ़िल्म “राजा हरिश्चन्द्र ” को उन्होने ही डायरेक्ट किया था. तब से लेकर आज तक उसी मुंबई शहर अपना काम कर रही है जहाँ फाड़के ने इंडस्ट्री की नीव रखी थी. 



जानते है मराठी सिनेमा क्या है ?  

1953 मे सबसे पहला नेशनल अवार्ड जिस फ़िल्म को मिला था वो फ़िल्म मराठी ही थी. उस फ़िल्म का नाम था ” शामची आई ” ये फ़िल्म बेहतरीन साहित्य पर बनी थी. महाराष्ट्र मे महात्मा गाँधी जैसे बहोत ही पॉपुलर रहे है, ‘ साणे गुरूजी ‘उनके ही किताब पर आधारित ये फ़िल्म बनायीं गई थी. साहित्य से मराठी फ़िल्म का ये गठजोड़ आगे भी उम्दा नतीजे देता राहा है. 


मराठी सिनेमा का सुवर्ण काल 

1960-70 का दशक का गोल्डन काल कहाँ जाता है. इस काल मे डायरेक्टर वी शांताराम, पेंढारकर, एक्टर संध्या, मास्टर विनायक, जयश्री गड़कर, परांजपे जैसे दिग्गज लोगो ने मराठी सिनेमा को बहोत बड़े मुकाम तक पहुंचाया है, जिनकी कला से आज भी बड़े बड़े एक्टर्स प्रभावित है. इसी काल मे “सवाल माझा ऐका, सामना,  सिहासन जैसे बड़ी बड़ी फिल्मे की गई. 


इस दौर की बहोतसी फिल्मे मराठी लोकनाट्य “तमाशा ” पर आधारित है. तमाशा एक कल्चरल स्वरुप का होता है. फिर बहोत बड़े कलाकार का आगमन इंडस्ट्री मे होता है जिनका नाम है “दादा कोंडके ” इन्होने मराठी फ़िल्म मे कही हिट फिल्मे बनायीं है. पाण्डु हवलदार, राम राम गंगाराम, बोट लावील तिथे गुदगुल्या जैसे सुपरहिट फिल्मे दी है. उनकी कॉमेडी एक अलग ही हुवा करती थी और लोग इसे बहोत पसंद किया करते. सबसे बड़ी बात ये है की दादा कोंडके के नाम सबसे ज्यादा सिल्वर जुबली फ़िल्म देने का रिकॉर्ड है वो भी नौव बार, ये रिकॉर्ड गिनीज बुक मे दर्ज किया गया है. 


इसी दौर मे मराठी फ़िल्म को श्रीराम लागु, निडु फुले, मोहन आगाशे जैसे दिग्गज अभिनेता दिए है. जो आज दिग्गज के रूप मे नवाजे जाते है. कुछ ही सालो बाद इंडस्ट्रीज को कॉमेडी पिक्चर्स का दौर आगे ले जाने मे दो दिग्गज कलाकार उभरकर आये जिनका नाम है ‘ अशोक सराफ ‘ और ‘ लष्मीकांत बरडे ‘ एक दशक से ज्यादा मराठी इंडस्ट्रीज का भार अपने कन्दे पर उठाया है. काफ़ी शनदार फ़िल्म इन्होने दी है.सचिन पिड़गावकर, महेश कोठारे जैसे कलाकार इस दौर मे पॉपुलर रहे है. इसी के बिच उस फ़िल्म को याद करना चाहिए जिसने काफ़ी तहलका मचा दिया था. 1991 मे आयी फ़िल्म ” महेरची साड़ी ‘ ( मइके की साड़ी ) काफ़ी ज्यादा पॉपुलर रही है इसमे मुख्य भूमिका अलका कुबल ने निभाया है. एक सिनेमा हॉल मे ये फ़िल्म लगातार दो सालो तक चली थी. तब की ये सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फ़िल्म थी. 


मराठी फ़िल्म का पतन का दौर और वापसी 

एक के दशक से मराठी फ़िल्म के बहोत बुरे दिन आये अशोक सराफ और बेरदे का टाइम गुजर चूका था. फिर बॉलीवुड की फिल्मो ने असर करना शुरू कर दिया था. मराठी सिनेमा को अपनेही प्रदेश मे सिनेमा हॉल मिलना भी कठिन हुवा करता था. कही जगह म्यटणी शो यानी एक टाइम शो दिखाया जाता और बाकि टाइम हिन्दी फिल्मे दिखाई जाती थी. इसके बाद मराठी का ये भी दौर गुजरता चला गया और मराठी इंडस्ट्रीज ने अपनी  कहानियो का एक नया रूप बनाया और अच्छे अच्छे फिल्मे प्रदर्शित करते चले गए और लोगो मे मराठी फिल्मो मे रूचि फिरसे जगती चली गई. 


2004 मे आयी श्वास पिक्चर्स से चालू हुई इस फ़िल्म ने नेशनल अवार्ड के साथ ऑस्कर के लिए भी भेजी गई थी. तब से लेकर आज तक मराठी इंडस्ट्रीज ने बहोत बड़ी उछाल प्राप्त की है. आज भी बहोत हिट फिल्मे इंडस्ट्रीज से आती है और करोड़ो लोग इसे पसंद करते है. 

 
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