Engineering Day के पिछे की काहानी जाने | सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या जी की काहानी

दोस्तों जैसा की आप जानते है हम आपके लिए हर दिन नयी नयी कहानियाँ लाते रहते है, इसी बदौलत आज इस प्लेटफार्म पर हजारों लोग जुड़े है दोस्तों, आपका हौसला बरकरार रहे और जो लोग अपने ज़िन्दगी मे आगे बढे है, उनसे आप प्रेरणा ले यही हमारा मकसद रहता है. आज हमने ऎसी काहानी लायी है जो आपको इंजीनियरिंग की बुनियाद तक समझाने वाली है. सिर्फ बात इंजीनियरिंग डे है, यहाँ तक बात सिमित नहीं रहती दोस्तों, उसके पिछे की काहानी को जानना उतना दिलचप्स रहता है. तो आज हम बात करने वाले Engineering Day के पिछे की काहानी.



इंजीनियरिंग डे यानी (अभियंता दिवस ) प्रत्येक वर्ष 15 सितम्बर को मनाया जाता है दोस्तों. इसमे इंजीनियर को सन्मानित किया जाता है और इंजीनियरिंग फिल्ड के प्रति लोगो को जागरूक किया जाता है. इसका मुख्य उदेश्य यही है की इंजीनियरिंग के क्षेत्र मे करियर बनने के लिए प्रेरित करना और जिन इंजीनियर ने हमारे देश के उन्नति मे जो अपना योगदान दिया है उन्हें सन्मानित करना है. दोस्तों इंजीनियर डे की बुनियाद किसने बनायीं यह तो आप जनतेहि है दोस्तों. 


उनका नाम है सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या जिन्होने अपने काबिलियत से सब कुछ बदलकर रख दिया जिनकी वजह से आज इंजीनियर डे मनाया जाता दोस्तों इनका योगदान आज हम जानने वाले है.

 



सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या ( sir Mokshagundam Visvesvaraya )


दोस्तों काहानी की शुरवात होती है 15 सितंबर 1861 मे इनके पिता का नाम M.k.निवास शात्री वो एक पेशे से स्कूल टीचर थे. इनकी माता का नाम वेंकटलक्ष्मम्मा जी एक हाउस वाइफ थी. बड़ी कठिन परिस्तिथियों मे उनका बचपन बिता था. आप समझ चुके होंगे की बात 1861 की है उस वक्त अग्रेज शासन होने से उनको बहोत दिक्कतों का सामना करना पडता था. 


बचपन बीतता चला गया और बचपन मे ही उनको गरीबी का सामना करना पड़ा जब विश्वेश्वरय्या जी 15 साल के थे तब उनके पिताजी का देहांत हो चूका था. इतने कम साल मे उन्होने अपने पिता को खोया था और घर का पूरा बोझ उनपर आ गया था. पर इनकी माँ को पता था की विश्वेश्वरय्या जी कितने पढ़ाई मे होशियार थे. पर वो उनको ऐसे नहीं रहने देती हालत भी बहोत ख़राब बन चुके थे. 


विश्वेश्वरय्या इस कठिन हालत से नहीं डरे उन्होने ठान लिया था की कुछ भी हो जाये हमें पढ़ना भी और आगे भी बढ़ना है, और उन्होने अपने पास जो नॉलेज था उसी  को सिखाने मे लगाने का विचार किया. जिससे कुछ पैसे भी मिलते और पढ़ाना भी हो जाता था उन्होने बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया था. उनके पास बचपन से ही बहोत नॉलेज और पढ़ाई मे बढ़िया होने के कारण उनके पास नॉलेज का भंडार था. वो काफ़ी इंटेलिजेंट थे दोस्तों और उनकी माँ ने भी उनको बहोत सहायता की उन्होने अपनी स्कूली पढ़ाई चिकबल्लापुर से पूरी की और साथ ही 1881 उनका ग्रेजुएट पूरा हुवा उनको BA डिग्री बहाल हुई. 


विश्वेश्वरय्या जी के इंजीनियरिंग करना उनका सपना था दोस्तों जैसा की हम जानते है इंजीनियर देश को बनाने  के लिए बैक बोन की तरह काम करते है. और उनमे एक अलग ही उत्साह पूर्ण जूनून होता है. आज कल हम देखे तो बहोत सारे कॉलेज खुल चुके है और डोनेशन बहोत लिया जाता है. इसी मे असली टैलेंट स्टूडेंट पिछे छूट जाते है दोस्तों ये तो आप जनतेहि है. विश्वेश्वरय्या जी का हमेशा कहना था की ” अच्छा खावो, अच्छे पैसे कमाओ और बहोत मेहनत करो “ उनका साइंस पर बहोत जोर था दोस्तों और उनका वह सपना था इसी को मध्यनजर रखते हुए उन्होने पुणे के लाइसेंसाइट इन सिविल इंजीनियरिंग मे एक्विवैलेन्ट इन DCE  बॉम्बे यूनिवर्सिटी से पुणे मे इंजीनियरिंग के लिए एडमिशन ली जो कॉलेज उस युग का सबसे अच्छा माना जाता था. 


उन्होने अपने दिमाग़ से वहाँ भी अच्छी काबिलियत के साथ उभरते चले गए उनके टीचर्स उनको इस टलैण्ट से बहोत खुश थे. उनको पता था की विश्वेश्वरय्या कहाँ तक जा सकते है. उन्होने पहला जॉब असिस्टेंट 1884 मे PWD मैनेजर के तौर पर ज्वाइन किया था. उनके लिए बहोत से दरवाजे जॉब के लिए खुले थे, हो भी क्यों ना ऐसे टलेंटेड इन्सान को कौनसी कम्पनी नहीं चाहती की ये इन्सान उनके कंपनी हो. उनके इतने अच्छे काम को देख कर उनको जल्द ही सैनिटेशन इंजीनियर के तौर पर चुना गया था. 


विश्वेश्वरय्या जी यहाँ तक नहीं रुके उनको डेक्कन के प्रॉब्लम के लिए इन्हे बुलाया गया था. डेक्कन यानी इरिगेशन डिपार्टमेंट मे आता है दोस्तों उस वक्त वो शहर  आज का जो विशाखा पट्ट्नम है, उस वक्त बहोत मे बाढ़ का पानी अन्दर आया करता यहाँ तक की बहने तक का डर था. थोड़ी बारिश आयी की पानी शहर के अन्दर चला आता इसी को मध्यनजर रखते हुए विश्वेश्वरय्या जी को बुलाया गया था. तो तब मानो उन्होने आटोमेटिक वैर वाटर फूटगेट का निर्माण किया और इसका पहला इनस्टॉल 1903 मे खड़क वासला (पुणे ) मे किया गया था. 


उन्होने बहोत सारे बड़े बड़े प्रोजेक्ट पर काम किया चाहे वो डैम का वॉटर रिज़र्व का काम हो, उन्होने ऐसे बड़े बड़े प्रोजेक्ट पर काम किया दोस्तों मैसूर (केरला) का कृष्णासागर डैम मे उनके ही सयोंग से बनाया गया था. 


दोस्तों मे आपको सरल भाषा मे समझाना चाहता हु, हमारे आस पास कुछ डैम होते, उसका उपयोग पानी पहुंचना तो होता पर जो बाढ़ आती है. उसपर भी कण्ट्रोल किया जाता और जब बरसात का मौसम आने से पहले डैम का पानी कुछ मात्र मे छोड़ दिया जाता है और बारिश अगर ज्यादा आयी तो इसमे जो ब्लॉकिंग सिस्टम होते उसके द्यौरा ही पानी छोड़ा जाता है. इसी ब्लॉकिंग की निर्माण विश्वेश्वरय्या जी ने किया था.


जो आज तक कारगर साबित होता है दोस्तों अब आप जान चुके होंगे की विश्वेश्वरय्या जी किस लेवल के इंजीनियर थे.इसी टैलेंट को देखते उन्हें बाहर देश भेजा गया एडेन ( देश यमन ) मे यहाँ भी उन्होने बहोत बड़े बड़े प्रोजेक्ट पर काम किया था. वहाँ उन्होने ड्रैनेड सिस्टम सिस्टम पर काम किया. विश्वेश्वरय्या जी ने कावेरी रिवर, कृष्णा राजा सागर डैम ऐसे बड़े बड़े प्रोजेक्ट पर उन्होने काम किया था. 


उनका मानना था की इंडस्ट्री को डेवलप करते जाओ रोजगार आटोमेटिक बढ़ता चला जायेगा. विश्वेश्वरय्या ने बहोत सारी इंडस्ट्री मे भी काम किया था दोस्तों. इसके साथ ही वो एक बहोत अच्छे इकोनॉमिस्ट भी थे. इसके साथ ही कही सारी इंस्टिट्यूट को भी इन्होने संभाला था. दोस्तों आप जान चुके होंगे अगर इरादा नेक हो हौसला मजबूत हो तो कोई काम असंभव नहीं होता एक इन्सान अपने ज़िन्दगी चाहे कितने भी बड़े बड़े काम कर सकता है दोस्तों बस हौसला होना जरुरी है. 


दोस्तों उम्मीद करता हु ये काहानी आपको पसंद आयी होंगी. 


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