भगत सिंह की अंतिम शौर्य की काहानी – जो आपको सोचने मे मजबूर करेंगी

दोस्तों हम आज बात करने वाले है ऐसे माहान आत्मा की जिन्होने आज हमें जीने का हक़ दिया और स्वतंत्र होने का हक़ दिलाया है. उनका नाम है शहीद भगत सिंह काफ़ी कम उम्र मे उन्होने बहोत बडा कार्य अपने देश के लिए किया है. आज हम उनकी आखिर वक्त की काहानी जानने वाले है दोस्तों. इससे आपको काफ़ी हौसला और देश के प्रति प्यार बढ़ाने वाली यह काहानी साबित होने वाली है चलिए दोस्तों जानते है.  




लाहौर सेंट्रल जेल मे 23 मार्च 1931 की शुरवात किसी आम दिन की तरह हुई थी, फर्क सिर्फ इतना था की सुबह सुबह जोर की आंधी आयी थी. लेकिन जेल की कैदियों को थोड़ा अजीबसा लग राहा था, जब 4 बजे वॉर्डन शरद सिंह ने जाकर कैदियों से कहाँ, की वो अपने अपने सेल मे चले जाये उन्होने इसके कारण का पता बाकि कैदियों को नहीं पता चलने दिया पर उन्होने कहाँ की ये आदेश ऊपर से आया है. 



हर किसीको लगने लगा था की बात कुछ और है, जेल का नाई बरकत हर कमरे के सामने फुसफुसाते हुए गुजरा, आज रात भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है. इस क्षण को सबको जगजोड़ कर रख दिया था. कैदीयों ने बरकत से कहाँ की वो फांसी के बाद भगत सिंह की कोई भी चीज, जैसे पेन, बुक जैसी चीजे उनको लाकर दे, ताकि वो अपने बच्चे और पोतीयों को इसे देकर गर्व से बता सके की वो भी इतने माहान भगत सिंह के साथ जेल मे थे. 



बरकत भगत सिंह के कोठरी मे गया और वहाँ से उनका कंगा और पेन लेकर आया और सारे कैदियों मे होड़ लग चुकी थी, की किसका उसपर अधिकार हो आखिर मे ड्रा निकालना पड़ा था. इसके बाद अब सारे कैदी चुप हो गए उनके नजरे सिर्फ कोठियों के रास्तो पर थी. भगत सिंह और उनके साथी उसी रास्ते से निकलने वाले थे. फिर जब भगत सिंह को लेके जा राहा राहा तो तब वहाँ पंजाब कांग्रेस के नेता भींम सेन ने उनको पूछा था की, उन्होने और आपके साथियो ने लाहौर कॉन्सपिरेसी केस मे अपना बचाव क्यों नहीं किया. तो भगत सिंह ने जवाब मे कहाँ की इन्क़लाबियो को मरना ही होता है, क्युकि उनके मरने से ही उनका अभियान मजबूत होता है, अदालत मे अपील से 
नहीं “



भगत सिंह को किताबें पढने का बहोत शौक था. वॉर्डन शरद सिंह भगत सिंह के लिए लाहौर के दयावरका दास लाइब्रेरी से किताबें लाया करते थे. भगत सिंह जेल के दीवारों मे बहोत किताबें पढ़ चुके थे. उनकी कोठरी काफ़ी सख्त थी, उसमे सिर्फ एक आदमी ही जा सकता था. भगत सिंह को फांसी देने से पहले उनके वकील प्राणनाथ मेहता उनसे मिलने आये उनके वकील ने लिखा था की, शहीद भगत सिंह अपने छोटेसे सेल मे शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे और इंकलाब ज़िंदाबाद कहकर मेहता का उन्होने स्वागत किया था. उन्होने मेहता से पूछा था की मेरी किताब रेवोलुशन लेनिन लाये की नहीं, जब मेहता ने उनको किताब दी तब वो उसे उसी समय पढ़ने लगे. मानो उनके पास अब ज्यादा समय ना बचा हो मेहता ने उनको पूछा की क्या आप देश को कोई सन्देश देना चाहेंगे, भगत सिंह ने कहाँ “सिर्फ दो सन्देश, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और इंकलाब ज़िंदाबाद ” इसके बाद उन्होने मेहता से कहाँ की वो पंडित और शुभाष चंद्र को मेरा धन्यवाद पंहुचा दे जिन्होने मेरी केस मे गहरी रूचि ली थी. 



इसके बाद मेहता राजगुरु के कोठरी मे पहुचे और उनके अंतिम शब्द थे “हम लोग जल्द मिलेंगे ” और इसके बाद सुखदेव ने कहाँ की उनके मरने के बाद जेलर से वो क्यारम बोर्ड ले ले, जो उन्होने उनको कुछ महीनों पहले दिया था. मेहता के जाने के बाद तीनो को बताया दिया गया की वक्त से 12 घंटे पहलेही फांसी दी जाने वाली है. अगले दिन 6 बजे फांसी देने की बजाय उन्हें उसी दिन श्याम 7 बजे फांसी दी जाएगी. मेहता ने दी हुई किताब से पढ़ते हुए भगत सिंह ने कहाँ की, क्या मुझे आप इस किताब का एक अध्याय भी नहीं पढ़ने देंगे. भगत सिंह ने मुस्लिम सफाई कर्मचारी बेबे से अनुग्रह किया की वो मुझे फांसी देने से पहले उनके घर से टिफ़िन लाये. लेकिन बेबे भगत सिंह की ये इच्छा पूरी नहीं कर सके उसी दिन उनको जल्द ही फांसी दी जाने वाली थी और उनको अन्दर नहीं जाने दिया गया. 

 
उनको फांसी के लिए जब बाहर लाया गया तो तीनो ने हाथ जोड़कर अपना सबसे प्यारा गीत गाने लगे 

कभी वो दिन भी आएगा 
की जब आज़ाद होंगे हम 
ये अपनी जमीन होंगी 
अपना आसमान होंगा 

फिर इनका वजन किया गया और आखिर स्नान करने के लिए कहाँ गया और उनको काले कपडे पहनाये गए लेकिन उनका मुँह नहीं ढका. चरत सिंह ने भगत सिंह के कानो मे कहाँ की तुम वाहे गुरु को याद करो भगत सिंह ने अपने जवाब मे कहाँ, फांसी का तख्ता लिए हुए बोले “पूरी ज़िन्दगी मैंने ईश्वर को याद नहीं किया असल मे मैंने कई बार गरीबो के कलेश के लिए ईश्वर को कोसा भी है, अगर मे अब उनसे माफ़ी मांगता हु तो वो कहेँगे की इससे बडा डरपोक कोई नहीं इसका अंत नजदीक आ राहा है इसलिए ये माफ़ी मांग राहा है” जैसे घड़ी मे 6 बजे वैसे ही फांसी दे दी गई और वो अमरता प्राप्त हो गए. 



दोस्तों ये छोटीसी काहानी झंजोड़कर रख देने वाली है, असल मे आज हमें जो आजादी मिली है ये उनकी है देन है. हम क्यों ना इसे उनकी याद मे और बेहतर भारत का निर्माण करें. 


Read Also 


अधिक जानकारी के लिए जुड़े रहे